जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर राजा ऋषभदेव जी इक्ष्वाकु वंश में राजा नाभी राज के पुत्र थे। श्री मद्भगवत् गीता अध्याय 4 श्लोक 1 से 3 में गीता ज्ञान दाता ने वेदों वाला ज्ञान अपने भक्त अर्जुन को श्री गीता जी में सुनाया है, कहा है हे अर्जुन! मैंने इस अविनाश योग को अर्थात भक्ति मार्ग को सूर्य से कहा था, सुर्य ने अपने पुत्रा वैवस्त अर्थात् मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्रा इक्ष्वाकु से कहा! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना किंतु उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी लोक में लुप्त प्राय हो गया। तू मेरा भक्त और प्रिय मित्रा है इसलिए वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझ को कहा हैे; क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है अर्थात् गुप्त रखने योग्य विषय है।
चारों वेदों अनुसार साधना करने वालों की दुर्गति हुई
मारीचि अर्थात् महाबीर जैन के जीव ने कौन -2 से जन्म धारण किए?
निम्न विवरण पुस्तक ‘‘आओ जैन धर्म को जाने‘‘, लेखक – प्रवीण चन्द्र जैन (एम.ए.
शास्त्राी), प्रकाशक – श्रीमति सुनीता जैन, जम्बूद्वीप हस्तिनापुर, मेरठ, (उत्तर प्रदेश) तथा “जैन संस्कृति कोश” तीनों भागों से मिला कर निष्कर्ष रूप से लिया है। श्री ऋषभदेव के पौत्रा (भरत के पुत्रा) श्री मारीचि (महाबीर जैन) के जीव के पहले के कुछ जन्मों की जानकारी –
उपरोक्त कर्म भोग को भोगने के पश्चात् पाप तथा पुण्य को भोगता हुआ मारीचि अर्थात् महाबीर वर्धमान (जैन) वाला जीव एक व्यक्ति बना, फिर महेन्द्र स्वर्ग में देव बना, फिर एक व्यक्ति बना, फिर महाशुक्र स्वर्ग में देव हुआ। फिर त्रिपृष्ट नामक नारायण हुआ। इसके पश्चात सातवें नरक में गया।
नरक भोग कर फिर एक सिंह (शेर) हुआ, फिर प्रथम नरक में गया। नरक भोग कर फिर सिंह (शेर) बना, फिर उस सिंह को एक मुनि ने ज्ञान दिया। फिर यह सिंह अर्थात् महाबीर जैन का जीव सौधर्म स्वर्ग में सिंह केतु नामक देव हुआ। फिर एक व्यक्ति हुआ। फिर सातवें स्वर्ग में देव हुआ, फिर एक व्यक्ति हुआ। फिर महाशुक्र स्वर्ग में देव हुआ। फिर व्यक्ति हुआ जो चक्रवर्ती राजा बना, फिर सहार स्वर्ग में देव हुआ। फिर जम्बूद्वीप के छत्रापुर नगर में राजा का पुत्रा हुआ। फिर पुष्पोतर विमान में देव हुआ।
इसके पश्चात् वही मारीचि वाला जीव चौबीसवां तीर्थकर श्री महावीर भगवान हुआ।
महावीर भगवान अर्थात् महावीर जैन ने तीन सौ तरेसठ पाखण्ड मत चलाये ।
उपरोक्त विवरण पुस्तक ‘‘आओ जैन धर्म को जानें‘‘ पृष्ठ 294 से 296 तक लिखा है तथा जैन संस्कृति कोश प्रथम भाग पृष्ठ 189 से 192, 207 से 209 तक है।
अधिक जानकारी के लिए पढ़ें पवित्र पुस्तक ज्ञान गंगा
चारों वेदों अनुसार साधना करने वालों की दुर्गति हुई
- विचारणीय विषय यह है कि राजा ऋषभदेव जी इक्ष्वाकु वंशज थे, यही वेदों वाला ज्ञान उन्हें परम्परागत प्राप्त था। राज्य करते-2 भी वे भक्ति साधना किया करते थे। एक दिन उन्हें पूर्ण परमात्मा एक ऋषि के वेश में मिला तथा अपना नाम कविराचार्य बताया। ऋषभ देव जी को ऋषि कविराचार्य ने बताया कि जो भक्ति आप कर रहे हो यह पूर्ण मोक्ष दायक नहीं है। पूर्ण सृष्टी रचना का ज्ञान दिया। ऋषभदेव को संसार से पूर्ण वैराग्य हो गया। पूर्ण परमात्मा ने बताया कि मैं सर्व सृष्टी रचनहार हूँ। जो वेदों में कविर्देव व कविः (कविर्) शब्द है वह मेरा वास्तविक नाम है। उसे चाहे ‘‘कवि’’ चाहे ‘‘कविर्’’ कहो। ऋषभदेव जी बहुत प्रभावित हुए तथा अपने कुल गुरु व अन्य ऋषियों से ‘‘कवि’’ ऋषि अर्थात् कविर्देव द्वारा बताए तत्वज्ञान के विषय में जानना चाहा कि यह सत्य है या व्यर्थ है? उन तत्वज्ञान हीन ऋषियों ने ऋषभ देव जी को भ्रमित कर दिया तथा कहा कि वह ऋषि ‘‘कविः (कविर्)’’ झूठ बोलता है। उसे वेदों का कोई ज्ञान नहीं है, ऋषभदेव जी ने उन ऋषियों द्वारा भिन्न-2 प्रकार का भ्रांतियुक्त ज्ञान स्वीकार कर लिया तथा पूर्ण परमात्मा के तत्वज्ञान को स्वीकार नहीं किया। अपने सर्व पुत्रों को भिन्न-2 राज्य देकर स्वयं गृह त्याग कर जंगल में साधना करने लगा। एक वर्ष तक निराहार रह कर साधना की फिर एक हजार वर्ष तक घोर तप किया।
- एक हजार वर्ष की तपस्या के पश्चात् काल ब्रह्म की प्रेरणा से स्वयं ही दिक्षा देने लगे। प्रथम दिक्षा अपने पौत्रा अर्थात् भरत के पुत्रा ‘‘मारीचि’’ को दी। मारीचि ने अपने दादा जी के द्वारा बताई वेदों अनुसार साधना की। उसके परिणाम स्वरूप ब्रह्मस्वर्ग (ब्रह्मलोक में बने स्वर्ग में) देव उपाधी प्राप्त की।
- फिर मनुष्य जन्म प्राप्त किया। कुछ समय स्वर्ग को प्राप्त हुआ तथा करोड़ों जन्म, गधे, कुत्ते, बिल्ली, वृक्षों आदि के जीवन प्राप्त होकर नरक में भी गया। वही मारीचि वाली आत्मा आगे चलकर श्री महाबीर जैन हुआ जो जैन धर्म का चैबीसवां तीर्थकर हैं। ऋषभ देव जी वाला जीव ही बाबा आदम रूप में उत्पन्न हुआ जो कि पवित्रा इसाई व मुस्लमान धर्म का प्रमुख माना जाता है। (यह प्रमाण पुस्तक ‘‘आओ जैन धर्म को जाने’’ पृष्ठ 154 पर है) पुस्तक ‘‘आओ जैन धर्म को जाने ’’ के पृष्ठ 294 से 296 तक लिखा है कि महाबीर जैन जी का जीव पहले ‘‘मारीचि’’ था जो ऋषभ देव जी के पुत्रा भरत का बेटा था।
मारीचि अर्थात् महाबीर जैन के जीव ने कौन -2 से जन्म धारण किए?
- कृप्या निम्न पढ़े:-
निम्न विवरण पुस्तक ‘‘आओ जैन धर्म को जाने‘‘, लेखक – प्रवीण चन्द्र जैन (एम.ए.
शास्त्राी), प्रकाशक – श्रीमति सुनीता जैन, जम्बूद्वीप हस्तिनापुर, मेरठ, (उत्तर प्रदेश) तथा “जैन संस्कृति कोश” तीनों भागों से मिला कर निष्कर्ष रूप से लिया है। श्री ऋषभदेव के पौत्रा (भरत के पुत्रा) श्री मारीचि (महाबीर जैन) के जीव के पहले के कुछ जन्मों की जानकारी –
- मारीचि अर्थात् महाबीर जैन वाला जीव पहले एक नगरी में भीलों का राजा था, जिसका नाम पुरुरवा था, जो अगले मानव जन्म में (ऋषभ देव का पौत्रा तथा भरत का पुत्रा) मारीचि हुआ। मारीचि (महावीर जैन) वाले जीव ने श्री ऋषभदेव से जैन धर्म वाली पद्धति से दीक्षा लेकर साधना की थी, उसके आधार से उसे क्या-क्या लाभ व हानि हुई – श्री महावीर जैन का जीव ब्रह्मस्वर्ग में देव हुआ, फिर मनुष्य हुआ, फिर देव हुआ, फिर मनुष्य हुआ, फिर स्वर्ग गया, फिर मनुष्य हुआ, फिर स्वर्ग गया, फिर भारद्वाज नामक व्यक्ति हुआ, फिर महेन्द्र स्वर्ग में देव हुआ। फिर नगोदिया जीव हुआ, फिर महाबीर जैन वाला अर्थात् मारीचि वाला जीव निम्न महाकष्टदायक योनियों को प्राप्त हुआ –एक हजार बार आक का वृक्ष बना, अस्सी हजार बार सीप बना, बीस हजार बार चन्दन का वृक्ष, पाँच करोड़ बार कनेर का वृक्ष, साठ हजार बार वैश्या, पाँच करोड़ बार शिकारी, बीस करोड़ बार हाथी, साठ करोड़ बार गधा, तीस करोड़ बार कुत्ता, साठ करोड़ बार नपुंसक (हीजड़ा), बीस करोड़ बार स्त्राी, नब्बे लाख बार धोबी, आठ करोड़ बार घोड़ा, बीस करोड़ बार बिल्ली तथा साठ लाख बार गर्भ पात से मरण तथा अस्सी लाख बार देव पर्याय को भी प्राप्त हुआ।
उपरोक्त कर्म भोग को भोगने के पश्चात् पाप तथा पुण्य को भोगता हुआ मारीचि अर्थात् महाबीर वर्धमान (जैन) वाला जीव एक व्यक्ति बना, फिर महेन्द्र स्वर्ग में देव बना, फिर एक व्यक्ति बना, फिर महाशुक्र स्वर्ग में देव हुआ। फिर त्रिपृष्ट नामक नारायण हुआ। इसके पश्चात सातवें नरक में गया।
नरक भोग कर फिर एक सिंह (शेर) हुआ, फिर प्रथम नरक में गया। नरक भोग कर फिर सिंह (शेर) बना, फिर उस सिंह को एक मुनि ने ज्ञान दिया। फिर यह सिंह अर्थात् महाबीर जैन का जीव सौधर्म स्वर्ग में सिंह केतु नामक देव हुआ। फिर एक व्यक्ति हुआ। फिर सातवें स्वर्ग में देव हुआ, फिर एक व्यक्ति हुआ। फिर महाशुक्र स्वर्ग में देव हुआ। फिर व्यक्ति हुआ जो चक्रवर्ती राजा बना, फिर सहार स्वर्ग में देव हुआ। फिर जम्बूद्वीप के छत्रापुर नगर में राजा का पुत्रा हुआ। फिर पुष्पोतर विमान में देव हुआ।
इसके पश्चात् वही मारीचि वाला जीव चौबीसवां तीर्थकर श्री महावीर भगवान हुआ।
महावीर भगवान अर्थात् महावीर जैन ने तीन सौ तरेसठ पाखण्ड मत चलाये ।
उपरोक्त विवरण पुस्तक ‘‘आओ जैन धर्म को जानें‘‘ पृष्ठ 294 से 296 तक लिखा है तथा जैन संस्कृति कोश प्रथम भाग पृष्ठ 189 से 192, 207 से 209 तक है।
अधिक जानकारी के लिए पढ़ें पवित्र पुस्तक ज्ञान गंगा



































