गुरुवार, 18 जून 2020

जैन धर्म

जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर राजा ऋषभदेव जी इक्ष्वाकु वंश में राजा नाभी राज के पुत्र थे। श्री मद्भगवत् गीता अध्याय 4 श्लोक 1 से 3 में गीता ज्ञान दाता ने वेदों वाला ज्ञान अपने भक्त अर्जुन को श्री गीता जी में सुनाया है, कहा है हे अर्जुन! मैंने इस अविनाश योग को अर्थात भक्ति मार्ग को सूर्य से कहा था, सुर्य ने अपने पुत्रा वैवस्त अर्थात् मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्रा इक्ष्वाकु से कहा! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना किंतु उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी लोक में लुप्त प्राय हो गया। तू मेरा भक्त और प्रिय मित्रा है इसलिए वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझ को कहा हैे; क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है अर्थात् गुप्त रखने योग्य विषय है।

चारों वेदों अनुसार साधना करने वालों की दुर्गति हुई

  • विचारणीय विषय यह है कि राजा ऋषभदेव जी इक्ष्वाकु वंशज थे, यही वेदों वाला ज्ञान उन्हें परम्परागत प्राप्त था। राज्य करते-2 भी वे भक्ति साधना किया करते थे। एक दिन उन्हें पूर्ण परमात्मा एक ऋषि के वेश में मिला तथा अपना नाम कविराचार्य बताया। ऋषभ देव जी को ऋषि कविराचार्य ने बताया कि जो भक्ति आप कर रहे हो यह पूर्ण मोक्ष दायक नहीं है। पूर्ण सृष्टी रचना का ज्ञान दिया। ऋषभदेव को संसार से पूर्ण वैराग्य हो गया। पूर्ण परमात्मा ने बताया कि मैं सर्व सृष्टी रचनहार हूँ। जो वेदों में कविर्देव व कविः (कविर्) शब्द है वह मेरा वास्तविक नाम है। उसे चाहे ‘‘कवि’’ चाहे ‘‘कविर्’’ कहो। ऋषभदेव जी बहुत प्रभावित हुए तथा अपने कुल गुरु व अन्य ऋषियों से ‘‘कवि’’ ऋषि अर्थात् कविर्देव द्वारा बताए तत्वज्ञान के विषय में जानना चाहा कि यह सत्य है या व्यर्थ है? उन तत्वज्ञान हीन ऋषियों ने ऋषभ देव जी को भ्रमित कर दिया तथा कहा कि वह ऋषि ‘‘कविः (कविर्)’’ झूठ बोलता है। उसे वेदों का कोई ज्ञान नहीं है, ऋषभदेव जी ने उन ऋषियों द्वारा भिन्न-2 प्रकार का भ्रांतियुक्त ज्ञान स्वीकार कर लिया तथा पूर्ण परमात्मा के तत्वज्ञान को स्वीकार नहीं किया। अपने सर्व पुत्रों को भिन्न-2 राज्य देकर स्वयं गृह त्याग कर जंगल में साधना करने लगा। एक वर्ष तक निराहार रह कर साधना की फिर एक हजार वर्ष तक घोर तप किया।



  • एक हजार वर्ष की तपस्या के पश्चात् काल ब्रह्म की प्रेरणा से स्वयं ही दिक्षा देने लगे। प्रथम दिक्षा अपने पौत्रा अर्थात् भरत के पुत्रा ‘‘मारीचि’’ को दी। मारीचि ने अपने दादा जी के द्वारा बताई वेदों अनुसार साधना की। उसके परिणाम स्वरूप ब्रह्मस्वर्ग (ब्रह्मलोक में बने स्वर्ग में) देव उपाधी प्राप्त की।
  •  फिर मनुष्य जन्म प्राप्त किया। कुछ समय स्वर्ग को प्राप्त हुआ तथा करोड़ों जन्म, गधे, कुत्ते, बिल्ली, वृक्षों आदि के जीवन प्राप्त होकर नरक में भी गया। वही मारीचि वाली आत्मा आगे चलकर श्री महाबीर जैन हुआ जो जैन धर्म का चैबीसवां तीर्थकर हैं। ऋषभ देव जी वाला जीव ही बाबा आदम रूप में उत्पन्न हुआ जो कि पवित्रा इसाई व मुस्लमान धर्म का प्रमुख माना जाता है। (यह प्रमाण पुस्तक ‘‘आओ जैन धर्म को जाने’’ पृष्ठ 154 पर है) पुस्तक ‘‘आओ जैन धर्म को जाने ’’ के पृष्ठ 294 से 296 तक लिखा है कि महाबीर जैन जी का जीव पहले ‘‘मारीचि’’ था जो ऋषभ देव जी के पुत्रा भरत का बेटा था।


मारीचि अर्थात् महाबीर जैन के जीव ने कौन -2 से जन्म धारण किए?

  • कृप्या निम्न पढ़े:-

निम्न विवरण पुस्तक ‘‘आओ जैन धर्म को जाने‘‘, लेखक – प्रवीण चन्द्र जैन (एम.ए.
शास्त्राी), प्रकाशक – श्रीमति सुनीता जैन, जम्बूद्वीप हस्तिनापुर, मेरठ, (उत्तर प्रदेश) तथा “जैन संस्कृति कोश” तीनों भागों से मिला कर निष्कर्ष रूप से लिया है। श्री ऋषभदेव के पौत्रा (भरत के पुत्रा) श्री मारीचि (महाबीर जैन) के जीव के पहले के कुछ जन्मों की जानकारी –


  • मारीचि अर्थात् महाबीर जैन वाला जीव पहले एक नगरी में भीलों का राजा था, जिसका नाम पुरुरवा था, जो अगले मानव जन्म में (ऋषभ देव का पौत्रा तथा भरत का पुत्रा) मारीचि हुआ। मारीचि (महावीर जैन) वाले जीव ने श्री ऋषभदेव से जैन धर्म वाली पद्धति से दीक्षा लेकर साधना की थी, उसके आधार से उसे क्या-क्या लाभ व हानि हुई श्री महावीर जैन का जीव ब्रह्मस्वर्ग में देव हुआ, फिर मनुष्य हुआ, फिर देव हुआ, फिर मनुष्य हुआ, फिर स्वर्ग गया, फिर मनुष्य हुआ, फिर स्वर्ग गया, फिर भारद्वाज नामक व्यक्ति हुआ, फिर महेन्द्र स्वर्ग में देव हुआ। फिर नगोदिया जीव हुआ, फिर महाबीर जैन वाला अर्थात् मारीचि वाला जीव निम्न महाकष्टदायक योनियों को प्राप्त हुआ –एक हजार बार आक का वृक्ष बना, अस्सी हजार बार सीप बना, बीस हजार बार चन्दन का वृक्ष, पाँच करोड़ बार कनेर का वृक्ष, साठ हजार बार वैश्या, पाँच करोड़ बार शिकारी, बीस करोड़ बार हाथी, साठ करोड़ बार गधा, तीस करोड़ बार कुत्ता, साठ करोड़ बार नपुंसक (हीजड़ा), बीस करोड़ बार स्त्राी, नब्बे लाख बार धोबी, आठ करोड़ बार घोड़ा, बीस करोड़ बार बिल्ली तथा साठ लाख बार गर्भ पात से मरण तथा अस्सी लाख बार देव पर्याय को भी प्राप्त हुआ।

उपरोक्त कर्म भोग को भोगने के पश्चात् पाप तथा पुण्य को भोगता हुआ मारीचि अर्थात् महाबीर वर्धमान (जैन) वाला जीव एक व्यक्ति बना, फिर महेन्द्र स्वर्ग में देव बना, फिर एक व्यक्ति बना, फिर महाशुक्र स्वर्ग में देव हुआ। फिर त्रिपृष्ट नामक नारायण हुआ। इसके पश्चात सातवें नरक में गया।


नरक भोग कर फिर एक सिंह (शेर) हुआ, फिर प्रथम नरक में गया। नरक भोग कर फिर सिंह (शेर) बना, फिर उस सिंह को एक मुनि ने ज्ञान दिया। फिर यह सिंह अर्थात् महाबीर जैन का जीव सौधर्म स्वर्ग में सिंह केतु नामक देव हुआ। फिर एक व्यक्ति हुआ। फिर सातवें स्वर्ग में देव हुआ, फिर एक व्यक्ति हुआ। फिर महाशुक्र स्वर्ग में देव हुआ। फिर व्यक्ति हुआ जो चक्रवर्ती राजा बना, फिर सहार स्वर्ग में देव हुआ। फिर जम्बूद्वीप के छत्रापुर नगर में राजा का पुत्रा हुआ। फिर पुष्पोतर विमान में देव हुआ।
इसके पश्चात् वही मारीचि वाला जीव चौबीसवां तीर्थकर श्री महावीर भगवान हुआ।
महावीर भगवान अर्थात् महावीर जैन ने तीन सौ तरेसठ पाखण्ड मत चलाये ।
उपरोक्त विवरण पुस्तक ‘‘आओ जैन धर्म को जानें‘‘ पृष्ठ 294 से 296 तक लिखा है तथा जैन संस्कृति कोश प्रथम भाग पृष्ठ 189 से 192, 207 से 209 तक है।

अधिक जानकारी के लिए पढ़ें पवित्र पुस्तक ज्ञान गंगा

बुधवार, 10 जून 2020

बाइबल में प्रमाण

विचार करें - जहाँ से पवित्र ईसाई व मुसलमान धर्म प्रथम पुरूष के वंश की शुरूआत हुई वहीं से मार-काट लोभ और लालच द्वेष परिपूर्ण है।

आगे चलकर इसी परंपरा में ईसा मसीह जी का जन्म हुआ। इनकी पूज्य माता जी का नाम मरियम तथा पूज्य पिता जी का नाम यूसुफ था। परन्तु मरियम को गर्भ एक देवता से रहा था। इस पर यूसुफ ने आपत्ति की तथा मरियम को त्यागना चाहा तो स्वपन में (फरिश्ते) देवदूत ने ऐसा न करने को कहा तथा यूसुफ ने डर के मारे मरियम का त्याग न करके उसके साथ पति-पत्नी रूप में रहे। देवता से गर्भवती हुई मरियम ने ईसा को जन्म दिया।हजरत

 ईसा से पवित्र ईसाई धर्म की स्थापना हुई। ईसा मसीह के नियमों पर चलने वाले भक्त आत्मा ईसाई कहलाए तथा पवित्र ईसाई धर्म का उत्थान हुआ।

प्रमाण के लिए कुरान शरीफ में सूरः मर्यम-19 में तथा पवित्र बाईबल में मती रचित सुसमाचार मती=1:25 पृष्ठ नं. 1-2 पर।


भगवान ने मनुष्य को शाकाहारी भोजन खाने के आदेश दिये हैं - पवित्र बाइबल
पवित्र बाइबल - उत्पत्ति  1:29 - फिर परमेश्वर ने उन से कहा, सुनो, जितने बीज वाले छोटे छोटे पेड़ सारी पृथ्वी के ऊपर हैं और जितने वृक्षों में बीज वाले फल होते हैं, वे सब मैं ने तुम को दिए हैं; वे तुम्हारे भोजन के लिये हैं:
1:30 - और जितने पृथ्वी के पशु, और आकाश के पक्षी, और पृथ्वी पर रेंगने वाले जन्तु हैं, जिन में जीवन के प्राण हैं, उन सब के खाने के लिये मैं ने सब हरे हरे छोटे पेड़ दिए हैं; और वैसा ही हो गया।

गुरुवार, 4 जून 2020

परमात्मा कि लीलाएं

1. कबीर परमात्मा मां से जन्म नहीं लेते।

उनका शरीर पांच तत्व से निर्मित हाड-मांस का नहीं है बल्कि एक तत्व का नूरी अमर शरीर है, इसलिए कबीर साहेब की जयंती नहीं, प्रकट दिवस मनाया जाता है। हाड चाम लहु ना मेरे, जाने सतनाम उपासी। तारन तरन अभय पद(मोक्ष) दाता, मैं हूं कबीर अविनाशी।।


2. कबीर प्रकट दिवस जयंती नहीं

कबीर साहेब जी के अवतरण दिवस को प्रकट दिवस के रूप में मनाया जाता है, ना कि जयंती रूप में। पूर्ण परमात्मा सबके जनक तथा सर्व उत्पत्ति कर्ता हैं। वे मां से जन्म लेकर नहीं आते। परमात्मा स्वयं प्रकट होकर अपनी लीला करते हैं। यह लीला केवल कबीर परमेश्वर जी ने की, इसलिए पृथ्वी पर उनके अवतरण को प्रकट दिवस रूप में मनाते हैं।

गरीब, ना मैं जन्म ना मरूँ, न आऊँ न जाऊं।
गरीबदास सतगुरू भेद से, लखो हमारा ठांव।।

3. परमात्मा अपनी जानकारी खुद ही बताता है।

गोरखनाथ जी से कबीर साहेब ने कहा था कि मेरा माता के गर्भ से जन्म नहीं हुआ। मेरा पाँच तत्व का शरीर नहीं है| जिस अविनाशी परमात्मा की लोग तलाश कर रहे हैं वह मैं ही हूँ।

कबीर सागर अध्याय अगम निगम
 बोध के पृष्ठ 41 के शब्द की वाणी-
अवधु अविगत से चल आया, कोई मेरा भेद मर्म नहीं पाया।
ना मेरा जन्म न गर्भ बसेरा, बालक है दिखलाया। काशी नगर जल कमल पर डेरा, तहाँ जुलाहे ने पाया।
पांच तत्व का धड़ नहीं मेरा, जा, ज्ञान अपारा। सत्य स्वरूपी नाम साहिब का, सो है नाम हमारा।।
परमात्मा स्वयं प्रकट होकार भी सन्त की भूमिका करते हैं। आज परमात्मा कबीर साहेब जी सशरीर प्रकट हैं संत रामपाल जी महाराज के रूप में। उन्हें पहचानिए, देर न कीजिये।

4. प्रकट दिवस व जयंती मैं अंतर

जयंती और प्रकट दिवस में अंतर जानें जो मां के गर्भ से जन्म लेते हैं, उनका जन्म दिवस मनाया जाता है लेकिन पूर्ण परमात्मा कबीर जी का प्रकट दिवस मनाया जाता है क्योंकि वह अविनाशी परमात्मा है।


5. परमात्मा चारों युगों में आते हैं

चारों युगों में सिर्फ कबीर परमात्मा के प्रकट होने के ही प्रमाण हैं

1. सतयुग में सत सुकृत नाम से,
2. ब्रेता में मुनीन्द्र नाम से,
3. द्वापर में करुणामय नाम से,
कलयुग में अपने असली नाम कबीर नाम से प्रकट होते हैं |
 बाकी सभी देव मां के गर्भ से जन्म लेते हैं |

बुधवार, 3 जून 2020

रहचय

1. वास्तविक ज्ञान

सर्वप्रथम कबीर परमेश्वर ने ही कहा था कि परमात्मा सभी पापों से मुक्त कर सकता है।

आज संत रामपाल जी महाराज ने वेदों से प्रमाणित करके बता दिया कि परमात्मा साधक के घोर पाप को भी समाप्त कर देता है।
"देखिये प्रमाण यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्र 13"।

2. तत्वज्ञान

कबीर परमेश्वर जी ने शास्त्रानुकूल भक्ति तथा शास्त्रविरूद्ध भक्ति का भेद बताया।

शास्त्र अनुकूल साधना करने से सुख व मोक्ष संभव है तथा शास्त्रविरूद्ध साधना करने से जीवन हानि तथा नरक व चौरासी का कष्ट सदैव बना रहेगा।
(गीता अ.16, श्लोक 23-24)

3. गुढ ज्ञान


कबीर परमात्मा ने अध्यात्म केब से गूढ़ रहस्यों से पर्दाउ हुए बताया है कि भक्ति को जिंदा रखने के लिए मैंने ही द्रोपदी का चीर बढ़ाया था और मैंने ही हिरण्यकश्यप तथा कंस को मारा था।

मंगलवार, 2 जून 2020

परमात्मा इनको मिले

परमात्मा कौन है कहां रहता है कैसा है किस किस को मिला है ये अभी तक प्रश्नवाचक चिन्ह बना है।
आइए जानते हैं

01.कबीर साहेब द्वारा सर्वानंद को शरण में लेना

पंडित सर्वानंद ने अपनी माँ से कहा कि मैंने सभी ऋषियों को शास्त्रार्थ में हरा दिया है तो मेरा नाम सर्वाजीत रख दो लेकिन उनकी माँ ने सर्वानंद से कहा कि पहले आप कबीर साहेब को शास्वार्थ में हरा दो तब आपका नाम सर्वाजीत रख दिया जाएगा। जब सर्वानंद कबीर साहेब के पास शास्वार्थ करने पहुंचे तो कबीर साहेब ने कहा कि आप तो वेद-शास्त्रो के ज्ञाता हैं मैं आपसे शास्त्रार्थ नहीं कर सकता। तब सर्वानंद ने एक पत्र लिखा कि शास्त्रार्थ में सर्वानंद जीते और कबीर जी हार गए। उस पर कबीर साहेब जी से अंगूठ लगवा लिया। लेकिन जैसे ही सर्वानंद अपनी माँ के पास जाते तो अक्षर बदल कर कबीर जी जीते और पंडित सर्वानंद हार गए ये हो जाते।

 ये देखकर सर्वानंद आश्चर्य चकित हो गए और आखिर में हार मानकर सर्वानंद ने कबीर साहेब की शरण ग्रहण की।

02.धर्मदास को सदमार्ग दिखाना

भक्त धर्मदास जी बांधवगढ़ के धनी सेठ थे। देवी तथा शिव-पार्वती की पूजा, तीर्थों व धामों पर जाकर स्नान करना आदि शास्त्रविरुद्ध साधना किया करता था।

 धर्मदास जी जब तीर्थ यात्राओं पर निकले तो परमात्मा कबीर जी जिंदा महात्मा के वेश में उन्हें मिले और बार-बार ज्ञान की चोट की, सतलोक के दर्शन कराए और अपनी शरण में लिया।

03.सूखी टहनी हरी भरी करना

एक बार जीवा और दत्ता ने सन्तों की परीक्षा लेने की ठानी कि पृथ्वी पर कोई पूर्ण संत होगा तो उनके चरणामृत से सूखी डाली हरी हो जाएगी। सभी सन्तों महन्तों गुरुओं की परीक्षा ली, कुछ नहीं हुआ|

अन्त में जिन्दा महात्मा रूप में प्रकट कबीर साहिब जी का चरणामृत सूखी डाली पर डाला तो उसी समय वह हरी-भरी हो गयी। इसका प्रमाण आज भी गुजरात के भुरुच शहर में मौजूद है। वह पेड़ कबीरवट के नाम से जाना जाता है। जीवा दत्ता ने सूखे खूट पे, लेई परीक्षा भारी। साहेब कबीर के चरणामृत से, हरी हुई वो डारी।

04.कसाई का उद्धार

गरीब, राम नाम सदने पीया, बकरे के उपदेश।
अजामेल से उधरे, भक्ति बंदगी पेश।।

एक सदन नाम का कसाई था। संत गरीबदास जी ने बताया है कि परमेश्वर कबीर जी कहते हैं कि जो मेरी शरण में किसी जन्म में आया है, मुक्त नहीं हो पाया, मैं उसको मुक्त करने के लिए कुछ भी लीला कर देता हूँ। ऐसे ही सदन कसाई को शरण में लेकर सतभक्ति कराकर उद्धार किया था।

05.मीरा बाई को शरण में लेना

मीरा बाई पहले श्री कृष्ण जी की पूजा करती थी। एक दिन संत
रविदास जी तथा परमात्मा कबीर जी का सत्संग सुना तो पता चला कि श्री कृष्ण जी नाशवान हैं।समर्थ अविनाशी परमात्मा अन्य है।

संत रविदास जी को गुरूबनाया। फिर अंत में कबीर जी को गुरूबनाया। तब मीरा बाई जी का सत्य भक्ति बीज का बोया गया।
गरीब, मीरा बाई पद मिली, सतगुरु पीर कबीर।
देह छतां ल्यौ लीन है, पाया नहीं शरीर।।